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संजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• विकास की अवसà¥à¤¥à¤¾à¤à¤‚
पियाजे के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° विकास की अवसà¥à¤¥à¤¾à¤à¤‚ कà¥à¤°à¤®à¤¿à¤• होती हैं
संवेदी पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤• अवसà¥à¤¥à¤¾ – जनà¥à¤® से 2 वरà¥à¤· तक यह अवसà¥à¤¥à¤¾ चलती है। इसमें बचà¥à¤šà¥‡ का शारीरिक विकास तेज़ी से होता है। उसके à¤à¥€à¤¤à¤° à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤“ं का विकास à¤à¥€ होता है।
पूरà¥à¤µ संकà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• अवसà¥à¤¥à¤¾ – जनà¥à¤® से 7 वरà¥à¤· तक। इस अवसà¥à¤¥à¤¾ में बचà¥à¤šà¤¾ नई सूचनाओं व अनà¥à¤à¤µà¥‹à¤‚ का संगà¥à¤°à¤¹ करता है। इसी अवसà¥à¤¥à¤¾ में बचà¥à¤šà¥‡ में आतà¥à¤®à¤•ेंदà¥à¤°à¤¿à¤¤ होने का à¤à¤¾à¤µ अà¤à¤¿à¤µà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ पाता है। पियाजे कहते हैं कि छह साल के कम उमà¥à¤° के बचà¥à¤šà¥‡ में संजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• परिपकà¥à¤µà¤¤à¤¾ का अà¤à¤¾à¤µ पाया जाता है।
मूरà¥à¤¤ संकà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• अवसà¥à¤¥à¤¾ – यह सात से 11 वरà¥à¤· तक चलती है। इस उमà¥à¤° में बचà¥à¤šà¤¾ विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ मानसिक पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤à¤¾à¤“ं का पà¥à¤°à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¨ करता है। उदाहरण के दौर पर पहली ककà¥à¤·à¤¾ में पढ़ने वाले बचà¥à¤šà¥‡ ने तोते से जà¥à¤¡à¤¼à¥€ à¤à¤• कविता सà¥à¤¨à¥€ जिसमें डॉकà¥à¤Ÿà¤° तोते को सà¥à¤ˆ लगाता है और तोता बोलता है ऊईईई…। यह सà¥à¤¨à¤•र पहली ककà¥à¤·à¤¾ में पढ़ने वाले बचà¥à¤šà¥‡ ने कहा, “यह तो à¤à¥‚ठहै। डॉकà¥à¤Ÿà¤° तोते को सà¥à¤ˆ थोड़ी ही लगाते हैं।“ यहां à¤à¤• छह-सात साल का बचà¥à¤šà¤¾ अपने अनà¥à¤à¤µà¥‹à¤‚ के आईने में कविता में वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ होने वाले विचार को बहà¥à¤¤ ही यथारà¥à¤¥à¤µà¤¾à¤¦à¥€ ढंग से देखने की पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤à¤¾ का पà¥à¤°à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¨ कर रहा है, जिसे ग़ौर से देखने-समà¤à¤¨à¥‡ की जरूरत है।
औपचारिक-संकà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• अवसà¥à¤¥à¤¾ – यह अवसà¥à¤¥à¤¾ 11 साल से शà¥à¤°à¥‚ होकर पà¥à¤°à¥Œà¤¢à¤¼à¤¾à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ तक जारी रहती है। इस अवसà¥à¤¥à¤¾ में बालक परिकलà¥à¤ªà¤¨à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• ढंग से समसà¥à¤¯à¤¾à¤“ं के बारे में विचार कर पाता है। उदाहरण के तौर पर सातवीं ककà¥à¤·à¤¾ में पढ़ने वाली à¤à¤• छातà¥à¤°à¤¾ कहती है कि सर ने हमें पढ़ाया कि गांधी के तीन बंदर थे। उनसे हमें सीख मिलती है कि हमें बà¥à¤°à¤¾ देखना, सà¥à¤¨à¤¨à¤¾ और कहना नहीं चाहिà¤à¥¤ मैंने कहा बिलà¥à¤•à¥à¤² ठीक है। इस उमà¥à¤° के बचà¥à¤šà¥‡ à¤à¥€ सà¥à¤¨à¥€ हà¥à¤ˆ बातों पर सहज यकीन कर लेते हैं। फिर बात हà¥à¤ˆ कि बग़ैर देखे हमें कैसे पता चलेगा कि सही और ग़लत कà¥à¤¯à¤¾ है, यही बात सà¥à¤¨à¤¨à¥‡ के संदरà¥à¤ में लागू होती है। बोलने के संदरà¥à¤ में हम à¤à¤• चà¥à¤¨à¤¾à¤µ कर सकते हैं मगर वह पहले की दो चीज़ों के बाद ही आती है। यानि हमें अपने आसपास के परिवेश को समà¤à¤¨à¥‡ के लिठअपनी जà¥à¤žà¤¾à¤¨à¥‡à¤‚दà¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— करना चाहिठताकि हम समठसकें कि वासà¥à¤¤à¤µ में कà¥à¤¯à¤¾ हो रहा है और सही व गलत का फैसला हम तà¤à¥€ कर सकते हैं।
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